Thursday, 24 September 2026 Live24×7 News India media
Breaking
  • भारत की दो टूक- अधूरे सुधार से नहीं बदलेगी यूएनएससी की तस्वीर
Latest News

दिनेश शर्मा का शपथ के बाद शहीदों के सामने नतमस्तक होना क्यों है महत्वपूर्ण?(शाश्वत तिवारी)

By Gangesh M · · 5 min read · 6 views

किसी संवैधानिक पद की शपथ सामान्यतः एक औपचारिक प्रक्रिया मानी जाती है। संविधान, कानून, पद की गरिमा और प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन का संकल्प लिया जाता है। लेकिन कुछ पद ऐसे होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी केवल सरकारी फाइलों और कार्यालयों तक सीमित नहीं होती। उनके साथ इतिहास की स्मृतियां, भूगोल की संवेदनशीलता और राष्ट्र की सुरक्षा का एक बड़ा दायित्व भी जुड़ा होता है।

सेल्युलर जेल की दीवारों से निकला संकल्प।

अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का उपराज्यपाल पद ऐसा ही एक दायित्व है।
15 सितंबर 2026 को डॉ. दिनेश शर्मा ने अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के 14वें उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली। श्री विजयपुरम स्थित लोक निवास में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रविंद्र विठ्ठलराव घुगे ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्रशासन के मुख्य सचिव ज्ञानेश भारती ने नियुक्ति वारंट पढ़ा।
लेकिन इस शपथ ग्रहण के बाद जो दृश्य सामने आया, वह राजनीतिक या प्रशासनिक औपचारिकता से कहीं अधिक अर्थपूर्ण था।
नवनियुक्त उपराज्यपाल राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल पहुंचे। शहीद स्तंभ पर पुष्पांजलि अर्पित की। स्वतंत्रता आंदोलन के अमर सेनानियों के बलिदान को नमन किया। वीर विनायक दामोदर सावरकर की उस कोठरी को देखा, जहां उन्होंने ब्रिटिश शासन की कठोरतम यातनाओं के बीच अपने जीवन का लंबा और कठिन अध्याय बिताया था। आगंतुक पुस्तिका में अपने विचार दर्ज किए।
यहीं से इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा संदेश सामने आता है, किसी पद की वास्तविक गरिमा उस कुर्सी में नहीं, उस जिम्मेदारी की स्मृति में होती है जिसके कारण वह पद अस्तित्व में आया।
और अंडमान की धरती पर यह स्मृति सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम के उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों की ओर ले जाती है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया था।

अंडमान का नाम लेते ही सामान्य पर्यटक के मन में समुद्र, द्वीप, प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन की तस्वीर उभरती है। लेकिन भारतीय इतिहास के लिए अंडमान का अर्थ इससे कहीं बड़ा है।
यह वह भूमि है जहां ब्रिटिश शासन ने स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक क्रांतिकारियों को मुख्य भूमि से दूर ले जाकर कठोर कारावास में रखा। सेल्युलर जेल उसी इतिहास की सबसे शक्तिशाली स्मृतियों में से एक है। अंडमान प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी सेल्युलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में दर्ज करती है। यहां की दीवारें केवल ईंट-पत्थर की नहीं हैं। इन दीवारों में संघर्ष की आवाजें हैं। इन गलियारों में यातना की स्मृतियां हैं। इन कोठरियों में सपनों को कैद करने की कोशिश की कहानी है, और इन सबके बीच एक ऐसा भारत दिखाई देता है, जो उस समय राजनीतिक स्वतंत्रता से वंचित था, लेकिन स्वतंत्रता की चेतना से परिपूर्ण था। इसलिए जब कोई संवैधानिक पदाधिकारी शपथ लेने के तुरंत बाद सेल्युलर जेल जाता है तो यह केवल एक ऐतिहासिक स्थल का दौरा नहीं रह जाता। यह इतिहास के सामने वर्तमान का खड़ा होना बन जाता है। यह उस पीढ़ी के सामने आज की पीढ़ी का नतमस्तक होना है, जिसने स्वतंत्र भारत को देखा भी नहीं था, लेकिन उसके लिए अपना जीवन लगा दिया।

डॉ. दिनेश शर्मा द्वारा शहीद स्तंभ पर पुष्पांजलि अर्पित करने का दृश्य अपने आप में प्रतीकात्मक है। एक ओर नया संवैधानिक दायित्व है। दूसरी ओर वे लोग हैं, जिन्होंने किसी पद की आकांक्षा के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। आज लोकतंत्र में पद जनता की संवैधानिक व्यवस्था से आते हैं। अधिकार संविधान देता है और जिम्मेदारी भी संविधान ही निर्धारित करता है। लेकिन इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आंदोलन का संघर्ष मौजूद है। इसलिए शहीद स्मारक पर झुकना केवल श्रद्धांजलि नहीं है। यह स्वयं को याद दिलाना भी है कि सत्ता अंतिम लक्ष्य नहीं है, सार्वजनिक सेवा उसका माध्यम है। लोकतंत्र में किसी भी पद की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं होती कि उसके पास कितनी शक्ति है। परीक्षा यह होती है कि उस शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है।

सेल्युलर जेल में वीर विनायक दामोदर सावरकर की कोठरी भारतीय इतिहास का एक अत्यंत चर्चित और भावनात्मक स्थल है। सावरकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण और विवादित ऐतिहासिक व्यक्तित्व रहे हैं।

Gangesh M

Leave a Comment