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“न गुरूर, न लहजे में बनावट”, उनकी सादगी का ज़िक्र महफ़िल में बार-बार हुआ(शाश्वत तिवारी)

By Gangesh M · · 9 min read · 5 views

सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं, जिनके बारे में राजनीतिक मतभेद तो हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत आचरण, सहजता और उपलब्धता को लेकर समाज में बहुत कम शिकायतें सुनाई देती हैं। डॉ. दिनेश शर्मा का सार्वजनिक जीवन इसी श्रेणी का उदाहरण प्रस्तुत करता है।


राजनीति में पद मिलना बड़ी बात नहीं, पद पर रहते अपनी पहचान को पद से बड़ा बना लेना असली उपलब्धि।


एक शिक्षक, एक प्रोफेसर, एक संगठनकर्ता, लखनऊ के लंबे समय तक महापौर, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय वरिष्ठ नेता, डॉ. दिनेश शर्मा की यात्रा केवल पदों की सूची नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कार की कहानी है जिसमें शिक्षा, संगठन, संवाद, अनुशासन और सहज व्यवहार एक साथ दिखाई देते हैं।
डॉ. दिनेश शर्मा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में एक यह है कि उनकी राजनीतिक पहचान के पीछे उनका अकादमिक व्यक्तित्व हमेशा मौजूद रहा। वे लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़े रहे और वाणिज्य के प्रोफेसर के रूप में विद्यार्थियों के बीच अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 1988 में विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया और बाद में वाणिज्य विभाग में प्रोफेसर रहे।

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजनीति और शिक्षा, दोनों की अपनी अलग-अलग कसौटियां हैं। शिक्षा व्यक्ति को तर्क करना सिखाती है, जबकि राजनीति उसे समाज को समझना सिखाती है। शिक्षक के सामने विद्यार्थी होता है और राजनेता के सामने पूरा समाज। शिक्षक ज्ञान देता है, राजनेता को जनभावनाओं और जनअपेक्षाओं को समझकर निर्णय लेने पड़ते हैं। डॉ. शर्मा के सार्वजनिक जीवन में इन दोनों भूमिकाओं का मेल दिखाई देता है।

पद से बड़ा व्यक्तित्व होता है, व्यक्तित्व से बड़ा चरित्र होता है, और चरित्र से बड़ी कोई राजनीतिक पूंजी नहीं होती, डॉ. दिनेश शर्मा का जीवन इसी संदेश को सामने रखता है।

उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत विद्यार्थी परिषद से हुई और वे धीरे-धीरे संगठन में आगे बढ़ते गए। भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी के विभिन्न दायित्वों तक पहुंचने का उनका सफर बताता है कि संगठन में स्थायी स्थान केवल बड़े पद से नहीं, बल्कि लगातार काम करने से बनता है।
आज की राजनीति में अक्सर लोग सीधे परिणाम चाहते हैं। लेकिन संगठन की राजनीति धैर्य मांगती है। वर्षों तक कार्यकर्ताओं के साथ रहना, छोटे-बड़े कार्यक्रमों में भाग लेना, लोगों से संवाद करना और संगठन की विचारधारा को जमीन तक पहुंचाना, यही वह प्रक्रिया है जो किसी नेता को केवल चुनावी चेहरा नहीं रहने देती, बल्कि संगठन का हिस्सा बनाती है।
डॉ. दिनेश शर्मा का राजनीतिक जीवन इस दृष्टि से भी अध्ययन का विषय है, लखनऊ जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील शहर की राजनीति को समझना आसान नहीं है। नवाबी तहजीब, गंगा-जमुनी सामाजिक परंपरा, तेजी से बढ़ता महानगर, पुरानी बस्तियां, नई कॉलोनियां, व्यापारिक क्षेत्र, प्रशासनिक प्रतिष्ठान और बदलती नागरिक अपेक्षाएं, लखनऊ हमेशा से एक जटिल शहर रहा है। ऐसे शहर की नगर राजनीति में लंबे समय तक नेतृत्व करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है।
डॉ. दिनेश शर्मा वर्ष 2006 में पहली बार लखनऊ के महापौर चुने गए और 2012 में दोबारा इस पद पर पहुंचे। वे 2006 से 2017 तक महापौर रहे। महापौर का पद भले ही राज्य सरकार के किसी बड़े राजनीतिक पद जितना चर्चित न हो, लेकिन जनता के रोजमर्रा के जीवन से उसका सीधा संबंध होता है। सड़क, सफाई, प्रकाश, जल निकासी, नगर नियोजन, नागरिक सुविधाएं और शहर की मूलभूत समस्याएं, इन सबका सामना सीधे नगर नेतृत्व को करना पड़ता है। यही कारण है कि किसी नेता की वास्तविक प्रशासनिक समझ का एक बड़ा परीक्षण स्थानीय निकाय से भी होता है।
डॉ. दिनेश शर्मा के व्यक्तित्व की चर्चा करते समय उनकी सहजता और सरल व्यवहार का उल्लेख बार-बार सामने आता है। उन्हें सार्वजनिक जीवन में सहज उपलब्ध नेता के रूप में भी वर्णित किया गया है। यह गुण आज की राजनीति में और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि राजनीति केवल भाषणों से नहीं चलती। राजनीति संवाद से चलती है, और संवाद तभी संभव है जब नेता और कार्यकर्ता के बीच दूरी कम हो। एक ऐसा नेता जो अपने कार्यकर्ता की बात सुन सके, विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति से भी संवाद कर सके और आम नागरिक की समस्या को अपनी प्राथमिकता समझ सके, वह राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं रहने देता, बल्कि उसे समाजसेवा का माध्यम बनाता है।
डॉ. दिनेश शर्मा के व्यक्तित्व का सबसे प्रेरक पक्ष शायद यही है कि राजनीति में आने के बाद भी उनके भीतर का शिक्षक समाप्त नहीं हुआ।
एक शिक्षक का मूल स्वभाव होता है, समझाना, सुनना, प्रश्नों का उत्तर देना और नई पीढ़ी को तैयार करना।
राजनीति में भी यही गुण उपयोगी होते हैं।
एक अच्छा नेता केवल अपने लिए रास्ता नहीं बनाता। वह अपने बाद आने वाली पीढ़ी के लिए भी रास्ता तैयार करता है। यही वह अंतर है जो किसी पदाधिकारी और मार्गदर्शक में होता है।
डॉ. शर्मा का अकादमिक जीवन और संगठनात्मक अनुभव इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में शिक्षा की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद डॉ. दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। उनके पास शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग भी रहे।
एक शिक्षक के लिए शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मिलना विशेष महत्व रखता है। जिस व्यक्ति ने स्वयं विश्वविद्यालय में अध्यापन किया हो, उसे राज्य की शिक्षा व्यवस्था को देखने का अवसर मिलना निश्चित रूप से एक अलग प्रकार की जिम्मेदारी थी। यहां भी उनका अकादमिक अनुभव और प्रशासनिक दायित्व एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दिए।
लोकतंत्र में किसी भी राजनेता की आलोचना हो सकती है। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है।
लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत कटुता के बीच एक स्पष्ट अंतर होना चाहिए। डॉ. दिनेश शर्मा के सार्वजनिक जीवन को देखने का एक उपयोगी तरीका यही है कि राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत गरिमा, संवाद और शालीनता को बनाए रखना कितना आवश्यक है।
आज जब राजनीतिक भाषा लगातार अधिक आक्रामक होती जा रही है, तब ऐसे नेताओं का सार्वजनिक आचरण नई पीढ़ी को यह संदेश दे सकता है कि राजनीति में दृढ़ता और विनम्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आप अपने विचारों पर दृढ़ रह सकते हैं और फिर भी सामने वाले का सम्मान कर सकते हैं। यही लोकतांत्रिक संस्कार है।
किसी सार्वजनिक व्यक्ति के बारे में यह कहना कि उसका जीवन “निर्विवाद” रहा है, बहुत सावधानी से कहा जाना चाहिए। राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले किसी भी व्यक्ति के विचारों, बयानों या राजनीतिक निर्णयों पर बहस होना स्वाभाविक है। इसलिए डॉ. दिनेश शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता को केवल “विवादों से परे” कहने के बजाय उनकी दीर्घ सार्वजनिक यात्रा, संगठनात्मक स्वीकार्यता और व्यक्तिगत सरलता के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
सार्वजनिक अभिलेखों में उनके चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों की संख्या शून्य दर्ज थी।
यह तथ्य भी उनके सार्वजनिक जीवन की चर्चा में उल्लेखनीय है।
आज राजनीति में आने वाली युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह प्रसिद्धि और उपलब्धि के बीच अंतर समझे। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना और समाज में स्वीकार्यता हासिल करना अलग-अलग बातें हैं। कुछ मिनट का वायरल वीडियो किसी व्यक्ति को चर्चित बना सकता है, लेकिन दशकों का सार्वजनिक जीवन ही किसी नेता की वास्तविक परीक्षा करता है।

Gangesh M

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