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सरहदों के पार खुले अवसरों के द्वारः पासपोर्ट सेवा का देशव्यापी विस्तार

By admin · · 4 min read · 330 views

नई दिल्ली। एक दौर था जब भारत में पासपोर्ट बनवाना किसी ‘विशेषाधिकार’ या लंबी और जटिल कागजी लड़ाई जीतने जैसा माना जाता था। दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को एक छोटे से नीले पासपोर्ट के लिए कई दिनों का सफर तय करके बड़े शहरों के चक्कर काटने पड़ते थे। लेकिन बीते 12 वर्षों में, देश की विदेश नीति और नागरिक सेवाओं के बुनियादी ढांचे में एक मौन क्रांति आई है।
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवा को दफ्तरों की फाइलों से निकालकर आम आदमी की दहलीज तक पहुंचा दिया है। यह अब केवल विदेश यात्रा का एक दस्तावेज भर नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक विकास और वैश्विक पहचान का एक मजबूत प्रतीक बन चुका है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ‘क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारियों के सालाना सम्मेलन (आरपीओ कॉनफ्रेंस 2026)’ में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इस बदलाव के कुछ ऐसे जादुई आंकड़े साझा किए, जो इस बात की गवाही देते हैं।
उन्होंने बताया कि साल 2014 में जहां पूरे देश में महज 77 पासपोर्ट सेवा केंद्र (पीएसके) हुआ करते थे, वहीं विदेश मंत्रालय और डाक विभाग की अनूठी और कल्पित साझेदारी के चलते आज इनकी संख्या बढ़कर 545 के पार पहुंच चुकी है। इसके अलावा 454 ‘डाकघर पासपोर्ट सेवा केंद्रों’ (पीओपीएसके) के एक विस्तृत नेटवर्क ने इस सेवा को देश के सबसे दूर-दराज के और ग्रामीण अंचलों तक पहुंचा दिया है।
विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार डॉ. जयशंकर ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा आज पासपोर्ट की डिलीवरी पूरी तरह से सबके लिए आसान और सुलभ हो गई है। यह तेज़ है, सुरक्षित है और विकेंद्रीकृत है तथा इसकी पहुंच सबसे दूर-दराज़ के इलाकों तक है। हमारी विदेश नीति भारत को ‘विश्व बंधु’ के तौर पर स्थापित कर रही है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट को सम्मान और भरोसे के साथ देखा जाता है। हमारी ज़िम्मेदारी है कि यह पक्का करें कि यह दस्तावेज़ हासिल करने की प्रक्रिया एक अधिकार हो, न कि कोई संघर्ष।
सम्मेलन के दौरान सामने आए आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 में जहां देश में सालाना लगभग 83 लाख पासपोर्ट जारी किए जाते थे, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 1 करोड़ 38 लाख से अधिक हो गया है। यह छलांग न केवल व्यवस्था की सुगमता को दर्शाती है, बल्कि वैश्विक मंच पर आगे बढ़ने की देशवासियों की ‘उड़ान भरने की आकांक्षा’ को भी बयां करती है।
तकनीक के इस दौर में अब ‘पासपोर्ट सेवा कार्यक्रम संस्करण 2.0′ के माध्यम से डिजिटल गवर्नेंस को और सुदृढ़ किया जा रहा है। पुलिस वेरिफिकेशन के समय में आई भारी कमी और मोबाइल ऐप (एम पासपोर्ट सेवा) के जरिए घर बैठे आवेदन की सुविधा ने बिचौलियों के जाल को पूरी तरह खत्म कर दिया है। विकसित भारत’ की ओर बढ़ते देश के लिए तैयार हो रहे इस ‘ग्लोबल वर्कफोर्स’ के पीछे विदेश मंत्रालय की यह बड़ी सहज नीति है, जिसने हर आम भारतीय की वैश्विक आकांक्षाओं को पंख देकर देश की नागरिक सेवाओं को एक नए वैश्विक मानदंड पर स्थापित किया है।
(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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