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भाजपा का बंगाल : सुनील बंसल की परिकल्पना और के के उपाध्याय की रणनीति(आचार्य संजय तिवारी)

By admin · · 4 min read · 3 views

पश्चिम बंगाल में जो परिणाम आया है, वह सामान्य चुनावी नीति से नहीं बल्कि युद्ध जैसी रणनीति से संभव हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए चुनौती बने इस चुनाव में वैसे तो अनेक तन्त्र अपने अपने ढंग से जुटे थे। असली परीक्षा थी यहां के लिए जिम्मेदार बनाए गए राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल की। बंसल को लगभग एक साल पहले ही बंगाल भेजा गया था, बंसल के लिए यह ऐसी चुनौती थी, जिसमें सब कुछ विकट था। बंसल ने इस चुनौती को संकल्प में बदल कर अपनी टीम को सजाया और एक एक बूथ तक पकड़ बनाई। इसके लिए बंगाल में भाजपा के मीडिया समन्वयक के रूप में बंसल ने चुना वरिष्ठ पत्रकार और सक्षम रणनीतिकार के० के० उपाध्याय को। ऊपर से यह कार्य मीडिया समन्वय का दिख रहा था लेकिन उपाध्याय ने बंसल की टीम का सेनानायक बन कर रात-दिन एक कर दिया। सटीक सूचना और सटीक रणनीति के साथ बंसल की सेना मैदान में थी। कठिन चुनौतियों के बीच बंसल की इस सेना को जो सफलता मिली है, उस पर जितनी भी चर्चा की जाय, कम ही है।
इस कठिन माहौल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, चुनाव के
आखिरी पंद्रह दिनों में देश के गृहमंत्री अमित शाह खुद वहां डेरा डाले रहे। फिर भी यह बात सभी मानेंगे कि बंगाल से जो ऐतिहासिक परिणाम सामने आए, वह मात्र पंद्रह दिनों की तैयारी का नतीजा नहीं हो सकता। गृहमंत्री ने स्वयं कंट्रोल रूम में काफी समय भी बिताया।
यह सभी को जानना चाहिए कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और संगठन प्रभारी बंसल हमेशा मीडिया की सुर्खियों से दूर रहते हैं। उत्तर प्रदेश, ओडिशा हो, या पश्चिम बंगाल-जहां भी उन्हें जिम्मेदारी मिली, उन्होंने 100 फीसदी परिणाम दिए।
राजस्थान के रहने वाले सुनील बंसल (जन्म 1969) एबीवीपी से निकले, 1989 में राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के महासचिव चुने गए और आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक हैं। अमित शाह के विश्वसनीय सिपाही के रूप में वे भाजपा में संगठन के मजबूत स्तंभ माने जाते हैं। बंसल के सहयोगी के रूप में के० के० उपाध्याय हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा नाम हैं। अमर उजाला, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान में बड़ी जिम्मेदारी निभा चुके उपाध्याय ने बंसल का लक्ष्य आसान बनाया। यह संयोग ही है कि उपाध्याय भी उसी मूल स्थान से आते हैं, जो बंसल का गृह क्षेत्र है। इस जोड़ी ने गजब का परिणाम दिया।
बंगाल का चुनाव खास था। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि बंसल ने पच्चीस साल पहले बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर यात्रा की थी और इस समस्या को बंगाल की जनता पर पड़ने वाले असर को गहराई से समझा था। यही समझ उन्हें घुसपैठ, सांस्कृतिक अस्मिता और स्थानीय मुद्दों पर प्रभावी रणनीति बनाने में काम आई। बंगाल का परिणाम कोई रातोंरात चमत्कार नहीं था। सुनील बंसल और उनकी टीम ने धीरे-धीरे, सधे कदमों से बूथ स्तर पर संगठन खड़ा किया। एक-एक कार्यकर्ता जोड़कर ऐसी मानव श्रृंखला तैयार की कि ममता बनर्जी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
सुनील बंसल की ताकत शोर मचाने में नहीं, बल्कि चुपचाप बूथ-बूथ पर जीत हासिल करने में है। यही वजह है कि वे भाजपा के सबसे भरोसेमंद संगठनकर्ताओं में शुमार हैं। अब बंसल को उनके हनुमान के रूप में के० के० उपाध्याय का मिलना और इस बार के परीक्षण में उत्तीर्ण होना नई कहानी लिखने को तैयार है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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