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यूक्रेन संकट: दुनिया भर के राजनयिकों का नई दिल्ली लगा तांता बताता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा है भारत का कद-(जतन पाठक)

By admin · · 6 min read · 1 views

पिछले एक महीने में विश्व व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इसकी वजह है यूक्रेन पर रूसी सेना का हमला। अमेरिका सहित ज्यादातर देशों ने इसके लिए रूस को जिम्मेदार ठहराते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं भारत ने इस मसले पर किसी भी पाले में न खड़ा होकर तटस्थता बनाते हुए अपना स्टैंड लिया है। अपने राष्ट्रीय हितों को प्रमुखता पर रखते हुए भारत ने जिस कूटनीति का प्रदर्शन किया है उसका मुरीद पड़ोसी देश पाकिस्तान भी हो गया है। भारतीय विदेश नीति का ही नतीजा है कि आज दुनिया में भारत का कद तो बढ़ा ही है उसके साथ ही भारत का विचार भी दुनिया के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह दुनिया भर के राजनयिकों ने भारत में अपना डेरा डाला है वह इस बात की तस्दीक भी करता है।

बीते 15 दिनों को देखें तो नई दिल्ली में जिस तरह से विदेशी मेहमानों का तांता लगा था वह बताता है कि वैश्विक जमात में भारत की महत्ता काफी बढ़ गई है। पिछले महीने के आखिरी के दिनों में शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब कोई विदेशी राजनयिक भारत न आया हो। इनमें जापान के प्रधानमंत्री से लेकर आस्ट्रेलिया, ग्रीस, ओमान, ब्रिटेन, चीन, मेक्सिको के विदेश मंत्री एवं जर्मनी, यूरोपीय संघ के विशेष प्रतिनिधि और अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक शामिल हैं। इन सबके बीच भारतीय प्रधानमंत्री की आस्ट्रेलियाई पीएम से वर्चुअल बात भी हुई है। रूस के विदेश मंत्री के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री भारत आए। इजरायली प्रधानमंत्री को भी भारत आना था, लेकिन उनके कोरोना से ग्रस्त हो जाने के कारण उनकी यात्र टल गई। इस दौरान जहां भारतीय विदेश मंत्री मालदीव और श्रीलंका गए, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने बिम्सटेक देशों के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया। इन सब बातों से यह साफ हो जाता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से वैश्विक स्तर पर मची उथल-पुथल के बीच दुनिया की दिलचस्पी इस बात में है कि भारत का रुख क्या है।

युद्ध की शुरुआत से यह लग रहा था कि भारत अगर किसी पाले में नहीं खड़ा होता है तो वह फंस जाएगा। लेकिन भारत ने इस मामले को पूरी होशियारी से संभाला। उसने कूटनीति एवं बातचीत के जरिये इस समस्याइ का समाधान खोजने की वकालत करते हुए सबसे पहले यूक्रेन में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी पर ध्यान केंद्रीत किया, जिसमें वह सफल भी रहा। भारत इस मामले में अभी भी संतुलित रूख अपना रहा है। एक तरफ जहां भारत अमेरिका एवं पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंध का समर्थन नहीं कर रहा। वहीं दूसरी तरफ रूस को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन की करने की हिदायत भी दे रहा है। इसका नतीजा यह रहा कि पुराने सहयोगी रूस ने भारत के लिए कई ऑफरों का पिटारा खोल दिया है तो पश्चिमी देश भी भारत से नाराज नहीं हुए हैं।

इस युद्ध में उन सबकी आशंकाएं निर्मूल साबित हो गईं जिन्हें लगता था कि अगर भारत स्पष्ट विरोध नहीं करता है तो उसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। क्वॉड के दो सदस्य देशों जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों ने बीते दिनों मोदी से सीधा संवाद किया। जापान के प्रधानमंत्री फुमिओ किशिदा हाल में जब भारत आए तो उस दौरान कई रणनीतिक साझेदारियों पर सहमति बनने के साथ ही जापान ने अगले पांच वर्षों के दौरान भारत में 3.2 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश की प्रतिबद्धता जताई। वहीं ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मारिसन की मोदी से हुई वर्चुअल बातचीत में कई द्विपक्षीय मसलों पर साझेदारी बढ़ाने के अलावा भारत में 1,500 करोड़ रुपये का निवेश करने का ऐलान भी किया। यह भारत में ऑस्ट्रेलिया का अभी तक सबसे बड़ा निवेश प्रस्ताव है। यहां यह समझने वाली बात है कि भारत की इस अंतरराष्ट्रीय अहमियत के पीछे भारतीय प्रधानमंत्री की वह कूटनीतिक सक्रियता है, जो उन्होंने बीते सात-आठ वर्षों में और यहां तक कि कोरोना काल में भी दिखाई।

इसे भारत की विदेश नीति की सफलता ही कहेंगे कि आज भारत की गिनती उन गिने चुने देशों में हो रही है जिसके प्रधानमंत्री से रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों ने कई बार बात की है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने तो यहां तक कह डाला भारत युद्ध में शामिल दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। इस संकट का समाधान चाहे जिस रूप में हो लेकिन यह तय है कि विश्व व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है और उसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। कि यही वजह है कि कई पश्चिमी देश भारत को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

लेखक_ अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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