पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता रद्द करे भारत सरकार: स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती
विशेष संवाददाता
वाराणसी।
सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद के समापन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि गंगा इस देश की विरासत तथा धरोहर है। इसकी रक्षा आवश्यक है। वक्ताओं ने कहा कि सिंधु का पानी सतलज, रावी, व्यास, झेलम आदि नदियों को नहरों से जोड़कर दिल्ली में यमुना में मिलाकर देश में उपयोग सरकार को करना चाहिए। भारत सरकार को नदियों के संबंध में समाप्त हो रहे पड़ोसी देशों के साथ समझौतों की समीक्षा करनी चाहिए। कला-संस्कृति की आड़ में पश्चिम की संस्कृति भारत पर थोपना गलत है। भारत के सभी लोग एक ही पूर्वज के संतान हैं। वर्तमान समय में अर्बन नक्सल भारत को जलाने में लगा है।
जल समझौते और राष्ट्रहित विषयक सत्र के मुख्य वक्ता एवं गंगा महासभा तथा अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि हम संतों की मांग है कि नदी जल से संबंधित जो समझौते पाकिस्तान एवं पड़ोसी देशों से हुए हैं और समाप्त हो रहे हैं, उनका नवीनीकरण नहीं होना चाहिए। सिंधु नदी जल समझौता स्थगित के साथ पर सदा के लिए रद्द करके उसके जल का उपयोग भारत में होने चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि आज हम सजग नहीं रहे तो आगे जल संकट रहेगा। जल का संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि भविष्य में तीसरा विश्वयुद्ध तेल नहीं, जल के लिए होगा।
काशी विद्यापीठ के कुलपति एवं संस्कृति संसद के समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण करना है। चरित्र निर्माण के लिए संस्कृति का ज्ञान आवश्यक है और यह ज्ञान परिवार से आता है। इसके लिए संस्कार आवश्यक हैं। उन्होंने देश की माताओं से निवेदन किया कि छोटे बच्चों को उनके मनोरंजन के लिए मोबाइल पकड़ाकर भूल न करें। मोबाइल के कारण बच्चे का भविष्य प्रभावित हो रहा है। बच्चों को मोबाइल के स्थान पर संस्कार दें तथा उसको सनातन संस्कृति से जोड़ें।
वरिष्ठ वैज्ञानिक (डी.आर.डी.ओ.) डॉ. अनंत नारायण भट्ट ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः व्यवस्थित और स्थापित करने की आवश्यकता है। गंगा की अविरल धारा में संस्कृति और विज्ञान दोनों सम्मिलित है। हमें गंगा, नीम और तुलसी आदि में छिपे स्वास्थ्य विज्ञान और चिकित्सकीय महत्व को पूरी दुनिया में फैलाना चाहिए। यही हमारी परंपरा की थाती है।
विश्व हिन्दू परिषद् के अन्तर्राष्ट्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि सामाजिक समरसता भारत के जीवन का आधार है। हमारे वैदिक ऋषियों ने ही विश्व एक कुटुंब की बात कही थी। भेदभाव और अस्पृश्यता भारतीय समाज पर एक कलंक है एवं हमें इसे मिटाकर समस्त राष्ट्र को एकसूत्र में बांधना चाहिए। हिंदू संस्कृति के मूल मंत्र को समझकर उसी के अनुसार, हमें कार्य करने चाहिए। भारत अपनी संस्कृति के आदर्शों के कारण अनंतकाल से चली आ रही है।
इस सत्र के अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष व कैवल्य पीठाधीश्वर पूज्य जगद्गुरु अविचल देवाचार्यजी महाराज ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनि भी उस कालखंड के वैज्ञानिक थे। गंगा जल अनंतकाल तक प्रदूषणरहित एवं जीवनरक्षक अमृत जल है। इसकी महत्ता वर्तमान समय में भी वैज्ञानिकों ने माना है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण ऐसा होना चाहिए कि बारिश का संपूर्ण पानी जमीन और तालाबों में सुरक्षित हो जाए। हमें जल प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। नगरीय विकास में बारिश का पानी बहने के लिए नहीं बल्कि उपयोग में आए की दृष्टि से प्रबंधन करना चाहिए।
इस सत्र के विशिष्ट वक्ता एवं गंगा महासभा के उपाध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने महामना मदन मोहन मालवीय के गंगाजल समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश गुलाम था। महामना का उद्देश्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ गंगा का संरक्षण करना भी था। वर्ष 1916 में विश्वविद्यालय का विधेयक पास होने के बाद महामना हरिद्वार गए और गंगाजल को लेकर ब्रिटिश सरकार से समझौता किया। इसमें गोमुख से गंगासागर तक गंगा का अविरल प्रवाह बनाए रखने की गारंटी दी गई थी। साथ ही हिंदुओं की सहमति के बिना इसमें कोई बदलाव नहीं करने की बात थी। उन्होंने कहा कि सिंधु का पानी लहरों और सुरंगों के माध्यम से सतलज, व्यास, रावी और चिनाब को जोड़कर दिल्ली में यमुना में मिलना चाहिए, जिससे की वे भारत के उपयोग में आए। उन्होंने कहा कि पानी पाकिस्तान न जाए, सिंधु का पानी दिल्ली आए।

