10 जुलाई 2025गुरुपूर्णिमा विशेष:

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“सद्‌गुरु” के बिना आत्मिक यात्रा अधूरी
_ शाश्वत तिवारी

भारत की परंपरा में माना गया है कि बिना सद्‌गुरु के जीवन में वास्तविक ज्ञान संभव नहीं। जैसा व्यक्ति कर चिंतन होता है। वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता है। धर्म और अध्याय के क्षेत्र में गुरुपूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन केवल श्रद्धा या पूजन का नहीं, आत्मसमर्पण और कृतज्ञता से ओतप्रोत भावों का उत्सव है। यह अग्रसर है सदगुरु के चरणों में अपने प्रेम, श्रद्धा और विश्वास से दो बुद आंसू समर्पित कर जीवन में प्रकाशित मार्ग के लिए आभार प्रकट करने का।


सदगुरु रितेश्वर जी महाराज, श्री लाडली निकुंज वन, आनंदम धाम, वृंदावन।


जैसे शिल्पकार मूर्ति बनाने से पूर्व पत्थर की परख करता है और उससे सुंदर मूर्ति बनाता है, जैसे कुम्हार मिट्टी को आकार देता है, चित्रकार कैनवस पर चित्र उकेरता है, सद्‌गुरु ठीक उसी प्रकार शिष्य को गढ़ते हैं। शिष्य के मन-मस्तिष्क की धूल झाड़ कर उसमें छिपे दिव्य तत्व को सद्‌गुरु जाग्रत करते हैं। शिष्यों में संवेदना भरकर उसे सच्चा मनुष्य बनाते हैं।
सद्‌गुरु की उपस्थिति का सबसे बड़ा संकेत तब मिलता है, जब कारण विहीन आनंद का अनुभव होने लगे। वह अपने ज्ञान के माध्यम से ऐसा शिष्य गढ़ते हैं, जिसे देखकर जगत दंग रह जाए। जैसे रामकृष्ण परमहंस ने स्पर्श मात्र से विवेकानंद को ईश्वर का साक्षात्कार करा दिया। विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की गूंज विश्व में पहुंचाई। उन्होंने जीवन का संदेश दिया- आनंद बाहर नहीं, भीतर है, संग्रह में नहीं, त्याग में है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि सामान्य आसक्ति पतन का कारण बनती है, लेकिन यदि वह आसक्ति किसी समर्थ गुरु के प्रति हो, तो जीवन को नई दिशा देती है। माता-पिता, मित्र और मार्गदर्शक की भूमिका सद्‌गुरु निभाते हैं। यह नीति, निष्ठा और सद्‌गुणों की सिंचाई करते हैं, दुर्गुणों का संहार कर आत्मा को शुद्ध बनाते हैं।
इसलिए संत कबीर ने कहा है, ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।’
सद्‌गुरु के प्रति सूरदासजी का भाव देखिए। वह कहते हैं, ‘गुरु और गोविंद में भेद कौन देखता है, ये एक ही हैं। गुरु साक्षात परब्रह्म हैं। मैंने जो कुछ गाया, वह गुरु के रूप में श्रीनाथजी को गाया है।’
पुराणों में यदु राजा की कथा आती है, जो भौतिक समृद्धि के बाद भी मानसिक शांति से वंचित थे। जब वह दत्तात्रेय अवधूत से मिले, तो उनकी आनंदमयी स्थिति देखकर चकित रह गए। दत्तात्रेगुरुपूर्णिमाय ने चताया कि उन्होंने प्रकृति और जीवन से 24 गुरु बनाए और उनसे सीखा। यह तो गुरुकी महिमा है। यही तो सनातन परंपरा की अद्भुत देन है, ‘गुरुबिनु भव निधि तरइ न कोई, जो बिरंचि संकर सम होई।’
गुरुपूर्णिमा वह दिन है, जब हम अपने जीवन के उस प्रकाश-स्तंभ को नमन करते हैं।
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(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

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